मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

मैं क्या ग़लत करता हूँ

मैं क्या गलत करता हूँ
एक कवि से मांगता हूँ
 उसका इमानदारी से भरा दिल |


एक फुल से चाहता हूँ
उसकी प्यार भरी गंध |



नदी के जल के पास रखता हूँ
मछलियों के संग
तैरने की इच्छा |
मैं क्या गलत करता हूँ
पत्नी के आँखों में ढूंढता हूँ
खोई हुई प्रेम भरी
चिट्ठियों का मजमून |
बच्चों में ढूंढता हूँ
भविष्य के रास्तों की गंध  |
स्वर्ग सिधारे पुरखों से
मांगता हूँ
धरती के चेहरे पे फैली
विवाइयों के लिए माफ़ी |
मैं क्या गलत करता हूँ
जो कविता से मांगता हूँ
अँधेरे में कंदील भर रोशनी
 धूप में पेंड भर छाँव
प्यास में घूँट भर जल |
-सुरेश सेन निशांत

कुछ कविताएँ

आग

*****

आग

जलाती है

जिलाती है

अनेक रूपों में

पेट की आग

सभी बन्धनों को

कर देती है राख

वासना की आग

सुलगा देती है किवाड़

विचारों की आग का धधकाना

इस्पात का शुद्ध होना है

रोटी और आग का रिश्ता

जीवन से जुड़ता है .




अलाव

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सर्दी के दिनों में

दिन ढलते ही

जल जाता है

अलाव

आग सेंकने के साथ

लोग साझा करते है

एक- दुसरे का दुःख -दर्द

करते हैं सलाह -मशविरा |

किस्सों -कहानियों से

बच्चों में डाला जाता है संस्कार ,

शिष्टाचार |

आग के मद्धिम पड़ने के बावजूद भी

देर रात तक करते हैं

चौकीदारी |

सुबह फैली राख

प्रमाणित कराती है

द्वार के सामाजिक विस्तार को



बूढी माँ

*********

वह नहीं छोड़ना चाहती

अपने बूढ़े घर को खण्डहर को

छोड़ गए जिसमें उसे

उसके बच्चे

उन्हें इंतजार है उसकी मौत का

इससे पहले यह खंडहर

नहीं बन सकता महल |

उसका दर्द ,उसकी करांह

फँस कर रह जाती

दीवार की दरारों में |

कोने में सहेज कर रखी गयी

टूटी -फूटी मूर्तियों के सामने

ऱोज कुछ बुदबुदाती

शायद मांगती दुआ

बच्चों की सलामती का

या करती शिकायत हम सफ़र से

जो उसे पथरीली राहों में छोड़ गया

एक झोले में ही सिमट कर रह गया है

उसका साज-सिंगार

जिसमें टूटे दांतों वाली कंघी

एक शीशे का टुकड़ा

और न जाने क्या क्या ठूसा हुआ है

कभी -कभी कभी वह गुन-गुनाती है

अपनी झाड़ू के साथ

या खूंटी में टगा पोटरियों का थैला निकाल

कुझ खोजने के क्रम में

खो जाती स्मृतियों में और उमड़ पड़ते आखों में आंशू|

बूढी माँ

समय बेसमय

खटखटाती बर्तन

और सोने से पहले संगों देती

अपने कपड़े-लत्ते

और सब कुछ क्योकि

रोज सोने के साथ

सो जाना चाहती सदा के लिए |

सुबह चारपाई से उठ गए विस्तर

उसके जीवित होने का प्रमाण है |




 

सृजन की पीड़ा

*******************

अभी लिखा ही कहाँ है मैंने

जब लिखूंगा तो विखर जाऊगां

जैसे जमने से पहले

बिखर जाता है बीज

और यह बिखरान ही शायद मुझे जोड़ेगा

ख़ुद से

फिर हो सकेगा सृजन

और

सहनी ही होगी

सृजन की पीड़ा|


यह खतरनाक समय है

यह खतरनाक समय है
जब मोटापा एक आम समस्या है
[
जबकि प्रेमचंद ने लिखा है मोटा होना बेहयाई है]
और रोटी पचाने के लिए

पैदल चलना जरूरी है
झूठ बोलना हमारी आदत नहीं मजबूरी है
जहाँ लिखा हो -पेशाब करना मना है
वहीं पेशाब करना जरूरी है
यह खतरनाक समय है ...

जब हत्या कि घटनाओं को
आसानी से आत्म हत्या में तब्दील किया जाता है
और बाप बेटी को भी छोड़ता हो
आप ही बताओ ऐसे समय में
कैसे जीया जाता है
.....
जब ईमादार होना लाचारी है
जिसे अवसर मिला
वही व्यभिचारी है|


..जब सत्य बोलना आग से खेलना है
और सरकारी घास को सब मिल कर चरतें हैं
समर्थ आदमी कानून से खेलतें है
और लाचार को सब मिलकर ठेलते हैं|

..
जब दोहरा चरित्र बड़े व्यक्तित्व की निशानी है

जो कुर्सी पर बैठा है
उसका खून खून है
बाकी का पानी है|

..
जब पक्षधरता सत्ता हथियाने का आसान तरीका है

बाँदी गाय हमारी मजबूरी है
आप कहतें हो वोट देना जरूरी है|
पक्ष विपक्ष एक ही सिक्के के दो पहलू है

राजनीति एक नाटक हैजिसमें अधिकतर दलबदलू है|

लोकतंन्त्र बिन पेंदी का लोटा है

कुर्सी पर वहीं काबिज़ है
जिसका चरित्र खोटा है|

यह खतरनाक समय है

जब विश्वास पीछे से वार करता है
आस्था मुंह छिपाने के काम आती है
और अदालतें
सच को झूठ
झूठ को सच बनाती हैं
जो सबसे बड़ा ढोगी है
वही योगी है

यह खतरनाक समय है
जब विकास का चक्र तेजी से चल रहा है
सही अर्थों में आदमी
रोबोट में बदल रहा है .




 

 

 



फिर तुम नहीं हो

फिर उमड़ा हूँ

सागर सा ,

महसूस करता हूँ

धरती -आकाश ,

कल्पना को उग आये पंख,

फिर तुम नहीं हो |

उकेरता हूँ सौन्दर्य की परतें ,

साकार करता हूँ अनुभूतियाँ,

उमग आती है

पूर्णता प्राप्त करने की लहर,

फिर तुम नहीं हो|

स्मृतियों को संजों कर

लिखता हूँ गीत ,

हूँ बेताब

खिलने को अधरों पर,

फिर तुम नहीं हो |

हुआ है मन चंचल,

गूंज रही हैं तुम्हारी स्वर लहरियां,

आखों में तुम्हारा रूप;

मिटा देना चाहता हूँ अपना अस्तित्व(तुझमें ),

फिर तुम नहीं हो |

जिजीविषा

हमारी अदम्य जिजीविषा
गहन अन्धकार में भी
जीवन की कठिन राह में
अंतिम साँस तक
संघर्ष की शक्ति देती है
हमारे मर जाने के बाद भी
वह नहीं मरती