फिर उमड़ा हूँ
सागर सा ,
महसूस करता हूँ
धरती -आकाश ,
कल्पना को उग आये पंख,
फिर तुम नहीं हो |
उकेरता हूँ सौन्दर्य की परतें ,
साकार करता हूँ अनुभूतियाँ,
उमग आती है
पूर्णता प्राप्त करने की लहर,
फिर तुम नहीं हो|
स्मृतियों को संजों कर
लिखता हूँ गीत ,
हूँ बेताब
खिलने को अधरों पर,
फिर तुम नहीं हो |
हुआ है मन चंचल,
गूंज रही हैं तुम्हारी स्वर लहरियां,
आखों में तुम्हारा रूप;
मिटा देना चाहता हूँ अपना अस्तित्व(तुझमें ),
फिर तुम नहीं हो |
सागर सा ,
महसूस करता हूँ
धरती -आकाश ,
कल्पना को उग आये पंख,
फिर तुम नहीं हो |
उकेरता हूँ सौन्दर्य की परतें ,
साकार करता हूँ अनुभूतियाँ,
उमग आती है
पूर्णता प्राप्त करने की लहर,
फिर तुम नहीं हो|
स्मृतियों को संजों कर
लिखता हूँ गीत ,
हूँ बेताब
खिलने को अधरों पर,
फिर तुम नहीं हो |
हुआ है मन चंचल,
गूंज रही हैं तुम्हारी स्वर लहरियां,
आखों में तुम्हारा रूप;
मिटा देना चाहता हूँ अपना अस्तित्व(तुझमें ),
फिर तुम नहीं हो |
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