मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

कुछ कविताएँ

आग

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आग

जलाती है

जिलाती है

अनेक रूपों में

पेट की आग

सभी बन्धनों को

कर देती है राख

वासना की आग

सुलगा देती है किवाड़

विचारों की आग का धधकाना

इस्पात का शुद्ध होना है

रोटी और आग का रिश्ता

जीवन से जुड़ता है .




अलाव

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सर्दी के दिनों में

दिन ढलते ही

जल जाता है

अलाव

आग सेंकने के साथ

लोग साझा करते है

एक- दुसरे का दुःख -दर्द

करते हैं सलाह -मशविरा |

किस्सों -कहानियों से

बच्चों में डाला जाता है संस्कार ,

शिष्टाचार |

आग के मद्धिम पड़ने के बावजूद भी

देर रात तक करते हैं

चौकीदारी |

सुबह फैली राख

प्रमाणित कराती है

द्वार के सामाजिक विस्तार को



बूढी माँ

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वह नहीं छोड़ना चाहती

अपने बूढ़े घर को खण्डहर को

छोड़ गए जिसमें उसे

उसके बच्चे

उन्हें इंतजार है उसकी मौत का

इससे पहले यह खंडहर

नहीं बन सकता महल |

उसका दर्द ,उसकी करांह

फँस कर रह जाती

दीवार की दरारों में |

कोने में सहेज कर रखी गयी

टूटी -फूटी मूर्तियों के सामने

ऱोज कुछ बुदबुदाती

शायद मांगती दुआ

बच्चों की सलामती का

या करती शिकायत हम सफ़र से

जो उसे पथरीली राहों में छोड़ गया

एक झोले में ही सिमट कर रह गया है

उसका साज-सिंगार

जिसमें टूटे दांतों वाली कंघी

एक शीशे का टुकड़ा

और न जाने क्या क्या ठूसा हुआ है

कभी -कभी कभी वह गुन-गुनाती है

अपनी झाड़ू के साथ

या खूंटी में टगा पोटरियों का थैला निकाल

कुझ खोजने के क्रम में

खो जाती स्मृतियों में और उमड़ पड़ते आखों में आंशू|

बूढी माँ

समय बेसमय

खटखटाती बर्तन

और सोने से पहले संगों देती

अपने कपड़े-लत्ते

और सब कुछ क्योकि

रोज सोने के साथ

सो जाना चाहती सदा के लिए |

सुबह चारपाई से उठ गए विस्तर

उसके जीवित होने का प्रमाण है |




 

सृजन की पीड़ा

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अभी लिखा ही कहाँ है मैंने

जब लिखूंगा तो विखर जाऊगां

जैसे जमने से पहले

बिखर जाता है बीज

और यह बिखरान ही शायद मुझे जोड़ेगा

ख़ुद से

फिर हो सकेगा सृजन

और

सहनी ही होगी

सृजन की पीड़ा|


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